रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन टिकट में बेस फेयर, रिजर्वेशन चार्ज, सुपरफास्ट चार्ज, डायनेमिक चार्ज, GST और कैटरिंग चार्ज जैसी अलग-अलग मदों का विवरण दिया जाता है। इन सभी शुल्कों को जोड़ने के बाद बनने वाली राशि को कुछ मामलों में अगले पांच रुपये के गुणक तक बढ़ा दिया जाता है। इसके चलते एक टिकट पर करीब 1 से 4 रुपये तक का अंतर देखने को मिल सकता है।
रिपोर्ट में रेलवे और IRCTC के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि पिछले पांच वर्षों में 229.07 करोड़ ऑनलाइन टिकट बेचे गए। औसतन प्रति टिकट करीब दो रुपये अतिरिक्त राशि माने जाने पर कुल रकम 458.14 करोड़ रुपये तक पहुंचती है। वर्तमान में IRCTC पोर्टल के जरिए प्रतिदिन 17 लाख से अधिक ऑनलाइन टिकट बुक होने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
इस व्यवस्था को समझने के लिए रिपोर्ट में दिल्ली-भोपाल के एक टिकट का उदाहरण दिया गया है। इसमें विभिन्न शुल्कों को जोड़ने पर कुल राशि 1,711 रुपये बनती है, जबकि भुगतान के लिए कुल देय राशि 1,715 रुपये दिखाई गई। यानी दोनों रकम के बीच चार रुपये का अंतर रहा।
रेलवे में द्वितीय श्रेणी साधारण (उपनगरीय) किराए को छोड़कर अन्य श्रेणियों में विभिन्न शुल्क जोड़ने के बाद राशि को अगले उच्चतम पांच रुपये के गुणक में पूर्णांकित करने का नियम बताया गया है। रेलवे की ओर से पूर्व में यह तर्क दिया गया है कि काउंटर पर खुदरा राशि की समस्या को देखते हुए यह व्यवस्था लागू की गई थी और ऑनलाइन तथा काउंटर टिकटों में समान किराया नीति रखने के लिए इसे ऑनलाइन बुकिंग में भी लागू किया गया।
हालांकि, IRCTC ने शुल्क वसूली में किसी अनियमितता से इनकार किया है। IRCTC के अनुसार ऑनलाइन टिकट बुकिंग में लिए जाने वाले शुल्क रेलवे के निर्धारित नियमों के अनुरूप हैं। रेलवे बोर्ड ही किराए से जुड़े नियमों और नीतिगत फैसलों के लिए जिम्मेदार है।