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राजस्थान के सरकारी स्कूलों की बदहाली और नया फोटो-वीडियो नियम: क्या स्कूलों की हकीकत अब कैमरे में कैद नहीं होगी?

राजस्थान के सरकारी स्कूलों की बदहाली के बीच 3,768 स्कूल भवनों के जर्जर पाए जाने की जानकारी सामने आई है। जानिए राजस्थान शिक्षा विभाग के नए आदेश में स्कूलों में फोटो, वीडियो, इंटरव्यू और लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर क्या नियम बनाए गए हैं और सरकार ने बच्चों की निजता व सुरक्षा के लिए क्या प्रावधान किए हैं।
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राजस्थान के सरकारी स्कूलों की बदहाली और नया फोटो-वीडियो नियम: क्या स्कूलों की हकीकत अब कैमरे में कैद नहीं होगी?
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राजस्थान में सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। राज्य के कई सरकारी विद्यालयों में जर्जर भवन, टूटे कमरे, पानी टपकती छतें, शिक्षकों की कमी और दूसरी बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं सामने आती रही हैं। जनवरी 2026 में विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार राजस्थान में 3,768 सरकारी स्कूल भवन जर्जर स्थिति में पाए गए थे। इनमें 2,558 भवनों को जर्जर घोषित किया गया था, जबकि 1,210 भवनों की जांच और प्रक्रिया जारी थी।

राज्य के कुछ इलाकों की जमीनी तस्वीर इससे भी ज्यादा चिंताजनक सामने आई है। राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) से संबंधित एक रिपोर्ट में ऐसे स्कूलों का उल्लेख किया गया जहां भवन की हालत खराब होने के कारण वैकल्पिक स्थानों पर पढ़ाई करानी पड़ी। बांदीकुई के बिशनपुरा स्थित एक सरकारी स्कूल में बच्चों की कक्षाएं पेड़ के नीचे चलती मिलीं। एक अन्य मामले में जर्जर भवन के कारण पढ़ाई के लिए आंगनबाड़ी केंद्र और फिर बारिश के दौरान वहां भी समस्या होने पर मंदिर परिसर का सहारा लेना पड़ा।

ऐसे माहौल में स्कूलों की वास्तविक स्थिति को सामने लाने में फोटो और वीडियो महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी जर्जर कमरे की तस्वीर, टपकती छत का वीडियो या बिना शिक्षक के चल रही कक्षा का दृश्य प्रशासन और आम जनता का ध्यान समस्या की ओर आकर्षित कर सकता है। पिछले समय में मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो के बाद भी कई स्कूलों की समस्याओं पर चर्चा तेज हुई है।

इसी बीच राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा विभाग ने 16 अगस्त 2026 को सरकारी विद्यालयों में बाहरी लोगों के प्रवेश और फोटो-वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों के अनुसार प्रधानाचार्य या संस्था प्रधान की पूर्व अनुमति के बिना किसी बाहरी व्यक्ति को स्कूल परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। सरकारी अधिकारी अपने अधिकृत आधिकारिक कार्य के लिए इसके अपवाद हैं। आगंतुकों को विद्यालय में प्रवेश से पहले विजिटर रजिस्टर में अपनी जानकारी दर्ज करनी होगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात फोटो और वीडियो को लेकर है। आदेश के मुताबिक प्रधानाचार्य की पूर्व लिखित अनुमति के बिना विद्यार्थियों, शिक्षकों या विद्यालय की गतिविधियों की फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग या लाइव स्ट्रीमिंग नहीं की जा सकेगी। यानी किसी व्यक्ति को अपनी मर्जी से सरकारी स्कूल में जाकर बच्चों, शिक्षकों या स्कूल की गतिविधियों का वीडियो बनाने की अनुमति नहीं होगी।

यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि इसे सीधे तौर पर नया ‘कानून’ कहना सही नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह राजस्थान माध्यमिक शिक्षा विभाग द्वारा जारी प्रशासनिक दिशा-निर्देश/परिपत्र है। इसमें बच्चों की सुरक्षा, गरिमा और निजता को आधार बनाया गया है। विभाग ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन, गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लेख किया है तथा बाल सुरक्षा से जुड़े कानूनी प्रावधानों का भी संदर्भ दिया है।

निर्देशों में यह भी कहा गया है कि विद्यार्थियों की फोटो, वीडियो या व्यक्तिगत जानकारी का ऐसा संग्रह, प्रकाशन या प्रसार नहीं होना चाहिए जिससे उनकी निजता, गरिमा या सुरक्षा प्रभावित हो। बिना अनुमति प्रवेश करने, परिसर छोड़ने से इनकार करने, अनधिकृत फोटो-वीडियो का प्रयास करने या विद्यालय के कामकाज में बाधा डालने की स्थिति में प्रधानाचार्य को स्थानीय पुलिस और जिला शिक्षा अधिकारी को सूचना देने के निर्देश दिए गए हैं। परिपत्र में भारतीय न्याय संहिता 2023, पॉक्सो एक्ट 2012, किशोर न्याय अधिनियम 2015 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 के तहत आवश्यक कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया है।

सरकार की ओर से इस व्यवस्था के पीछे मुख्य तर्क बच्चों की सुरक्षा और निजता है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कहा है कि यह मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, बल्कि बच्चों और शिक्षकों के सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण तथा विद्यार्थियों की निजता को ध्यान में रखकर व्यवस्था बनाई गई है।

हालांकि, इस आदेश को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि अगर किसी सरकारी स्कूल की छत टूट रही हो, बच्चे खराब भवन में पढ़ने को मजबूर हों या किसी स्कूल में मूलभूत सुविधाओं का अभाव हो, तो उसकी जमीनी स्थिति सामने लाने के लिए फोटो और वीडियो महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उनका सवाल है कि बच्चों की निजता की रक्षा जरूरी है, लेकिन क्या ऐसा रास्ता नहीं बनाया जा सकता जिसमें बच्चों की पहचान और निजी जानकारी सुरक्षित रखते हुए स्कूल की आधारभूत कमियों की तस्वीर या वीडियो सामने लाई जा सके?

इस विवाद का एक और पहलू भी है। आदेश ऐसे समय सामने आया जब राज्य में सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर सोशल ऑडिट और निरीक्षण की गतिविधियां चर्चा में थीं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक CJP की ओर से खराब स्थिति वाले सरकारी स्कूलों के निरीक्षण का अभियान घोषित किया गया था। इसके बाद शिक्षा विभाग के नए निर्देश सामने आए। हालांकि उपलब्ध परिपत्र में इस अभियान का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं है, इसलिए दोनों घटनाओं के बीच सीधा कारण-सम्बंध बताना उचित नहीं होगा।

असल चुनौती यही है कि बच्चों की निजता और स्कूलों की पारदर्शिता—दोनों को एक साथ कैसे सुरक्षित रखा जाए। बच्चों के चेहरे, नाम, व्यक्तिगत जानकारी या संवेदनशील परिस्थितियों का बिना अनुमति प्रसारण निश्चित रूप से गंभीर विषय है। लेकिन स्कूल भवन की टूटती दीवार, जर्जर छत, खाली कक्षा या अन्य सार्वजनिक बुनियादी सुविधाओं की स्थिति भी जनता और प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण जानकारी है। बेहतर व्यवस्था वह हो सकती है जिसमें बच्चों की पहचान और सुरक्षा की पूरी रक्षा करते हुए सार्वजनिक संसाधनों से जुड़े बुनियादी ढांचे की जवाबदेही और निरीक्षण का रास्ता भी खुला रहे।

राजस्थान में सरकारी स्कूलों की तस्वीर केवल आंकड़ों से नहीं समझी जा सकती। 3,768 जर्जर भवनों का आंकड़ा एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा करता है, जबकि पेड़ के नीचे पढ़ते बच्चे या वैकल्पिक स्थानों पर चलती कक्षाएं उस चुनौती की जमीनी तस्वीर दिखाती हैं।

इसलिए आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि स्कूल में वीडियो कौन बना सकता है। बड़ा सवाल यह होगा कि क्या बच्चों की सुरक्षा और निजता की रक्षा करते हुए सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति को जनता के सामने पारदर्शी तरीके से लाने का कोई प्रभावी रास्ता भी सुनिश्चित किया जाएगा? क्योंकि कैमरा बंद करने से स्कूल की समस्या खत्म नहीं होती—समस्या का समाधान तभी होगा जब जर्जर भवनों की मरम्मत, शिक्षकों की उपलब्धता और जरूरी सुविधाओं पर ठोस काम जमीन पर दिखाई दे।